पुरुषोत्तम मास में बुरहानपुर के प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में अविरल दुग्धाभिषेक, पूतना-वध प्रसंग से मिला आडंबर त्यागने का संदेश

देश-विदेश से पहुंच रहे श्रद्धालु, 30 दिनों तक चल रहा दिव्य अभिषेक एवं भागवत कथा महोत्सव
बुरहानपुर। सीलमपुरा स्थित प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में पवित्र पुरुषोत्तम (अधिक) मास के अवसर पर संपूर्ण माह भर चल रहे दिव्य धार्मिक आयोजनों में श्रद्धा और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। मंदिर में 30 दिनों तक भगवान के श्रीविग्रहों लक्ष्मी नारायण देव और हरीकृष्ण महाराज पर दुग्ध की अविरल धारा से अभिषेक किया जा रहा है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार संपूर्ण स्वामीनारायण संप्रदाय में ऐसा विशेष 30 दिवसीय दुग्धाभिषेक आयोजन विश्व स्तर पर केवल बुरहानपुर में ही आयोजित होता है,इस दिव्य आयोजन में देश, प्रदेश और विदेशों से श्रद्धालु पहुंचकर अभिषेक, पूजन-अर्चन तथा विभिन्न मनोरथों में सहभागी बन रहे हैं। भगवान स्वामीनारायण के जयघोषों के बीच श्रद्धालु हर्षोल्लास के साथ अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं।
भगवान स्वामीनारायण की पूजित मूर्ति का विशेष महात्म्य
मीडिया प्रभारी गोपाल देवकर ने बताया कि मंदिर में विराजित भगवान स्वामीनारायण की यह दिव्य मूर्ति अत्यंत प्राचीन एवं पूजनीय है। मान्यता है कि स्वयं भगवान स्वामीनारायण ने इस स्वरूप की पूजा-अर्चना की थी। धर्मसभा में मंदिर के कोठारी महंत पूज्य पी.पी. स्वामी ने बताया कि बुरहानपुर के श्रद्धालु पूर्वकाल में नियमित रूप से वड़ताल धाम दर्शन हेतु जाया करते थे। उनकी निष्ठा और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान स्वामीनारायण ने अपनी पूजित मूर्ति उन्हें प्रदान की थी। तभी से इस दिव्य स्वरूप की विधिवत पूजा-अर्चना एवं उत्सव परंपरा निरंतर जारी है।
भागवत कथा में पूतना-वध और नंद-वासुदेव मिलन का भावपूर्ण वर्णन
व्यासपीठ से पूज्य शास्त्री चिंतनप्रियदासजी स्वामी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध की कथा का रसपान कराते हुए नंदबाबा एवं वासुदेवजी के मिलन प्रसंग का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि वासुदेवजी पुत्र-वियोग के असहनीय दुख को सहन कर रहे थे, फिर भी मित्र नंदबाबा के सुख में स्वयं को आनंदित अनुभव कर रहे थे। यही सच्ची मित्रता का लक्षण है कि मित्र के सुख में सुखी होना और अपने बड़े से बड़े दुख को भी भुला देना।
कथावाचक ने इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए पूतना-वध प्रसंग सुनाया। शास्त्रों के अनुसार अत्याचारी राक्षसी पूतना निर्दोष बालकों की हत्या कर आतंक फैला रही थी। जब उसने नंदग्राम में भगवान श्रीकृष्ण के अद्भुत सौंदर्य और दिव्यता की चर्चा सुनी तो वह उन्हें मारने के उद्देश्य से सुंदर स्त्री का रूप धारण कर नंदभवन पहुंची।
आडंबर नहीं, सच्ची भक्ति प्रिय है भगवान को
कथा में बताया गया कि जब पूतना नंदभवन पहुंची, उस समय गोपियां भजन-कीर्तन करते हुए बालकृष्ण को झूला झुला रही थीं। पूतना ने बाहरी रूप से स्नेह और शुभकामना का प्रदर्शन किया, किंतु उसके हृदय में कपट और हिंसा भरी हुई थी। इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण ने उसे देखते ही अपनी आंखें बंद कर लीं।
शास्त्री चिंतनप्रियदासजी ने कहा कि भगवान बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता देखते हैं। मनुष्य को जैसा है, वैसा ही भगवान के समक्ष उपस्थित होना चाहिए। दिखावा, छल और कपट ईश्वर को स्वीकार नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि कथा, भजन, कीर्तन और सत्संग मनुष्य के व्यक्तित्व को दिव्य बनाने वाले आध्यात्मिक श्रृंगार हैं। जिस प्रकार बाहरी श्रृंगार शरीर को सुंदर बनाता है, उसी प्रकार कथा और भक्ति आत्मा को सुंदर बनाती है। भगवान को रिझाने के लिए बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा, भक्ति और सदाचार आवश्यक हैं।
भगवान की कृपा पाने के लिए जीवन को बनाएं सुंदर
स्वामीजी ने कहा कि भागवत कथा सुनने का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्म-परिष्कार है। कथा के माध्यम से व्यक्ति को अपने जीवन को सुंदर, पवित्र और सद्गुणों से युक्त बनाने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यक्ति भक्ति से विमुख करने वाले मार्ग पर चलता है, उस पर भगवान की विशेष कृपा नहीं होती।
उन्होंने कहा कि पूतना ने विष से भरे स्तनों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को मारने का प्रयास किया, किंतु सर्वशक्तिमान भगवान ने उसके प्राण हरकर उसका उद्धार कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने केवल पूतना का वध ही नहीं किया, बल्कि उसे मातृत्व भाव का सम्मान देते हुए मोक्ष भी प्रदान किया। यह भगवान की असीम करुणा और दयालुता का अद्भुत उदाहरण है।
श्रद्धालुओं ने लिया अभिषेक एवं कथा का लाभ
पुरुषोत्तम मास के इस विशेष आयोजन में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दुग्धाभिषेक, दर्शन, आरती एवं भागवत कथा का लाभ ले रहे हैं। मंदिर परिसर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह से सराबोर है तथा पूरे माह विभिन्न धार्मिक मनोरथ एवं उत्सव आयोजित किए जा रहे हैं।
