अधिक पुरुषोत्तम मास के अंतिम दिन उमड़ा आस्था का महासागर, 30 दिवसीय दिव्य अभिषेक महोत्सव का हुआ भव्य समापन

लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज का दूध, नारियल जल, आमरस, गन्ना रस सहित अनेक दिव्य पदार्थों से अभिषेक, छप्पन भोग अर्पित
बुरहानपुर। सीलमपुरा स्थित 200 वर्ष प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में अधिक पुरुषोत्तम मास के अंतिम दिन भी भक्ति, श्रद्धा और उल्लास का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। स्थिति यह थी कि मंदिर में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। महिलाओं की सुविधा के लिए मंदिर परिसर के बाहर विशेष टेंट में एलईडी स्क्रीन की व्यवस्था की गई थी, जिससे वे भी भगवान के दिव्य अभिषेक और दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकें।
अधिक पुरुषोत्तम मास के अंतिम दिन भगवान श्री लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज का दूध की अविरल धारा के साथ नारियल पानी, दही, माखन, केसर जल, पांच पवित्र नदियों के जल, गुलाब जल, हल्दी जल, आमरस, गन्ने का रस, जामुन का रस तथा अन्य दिव्य पदार्थों से भव्य अभिषेक किया गया। भगवान के इस दिव्य अभिषेक के दर्शन के लिए हैदराबाद, मुंबई, कुक्षी, वड़ताल, जलगांव सहित देश के विभिन्न स्थानों से श्रद्धालु पहुंचे। वहीं वड़ताल, गुजरात, मुंबई और जलगांव से संतों का भी आगमन हुआ, जिन्होंने इस दिव्य महोत्सव का लाभ लिया।
संत भवन एवं सभा मंडप निर्माण के लिए उमड़ा दानदाताओं का सैलाब
मंदिर परिसर में संत भवन एवं सभा मंडप निर्माण कार्य के लिए भी श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर सहयोग किया। अधिक पुरुषोत्तम मास के अंतिम दिन बड़ी संख्या में भक्तों ने दान देकर मंदिर विकास कार्यों में अपनी सहभागिता निभाई।
यह मूर्ति अत्यंत चमत्कारी, संतों और भक्तों की मनोकामनाएं करती है पूर्ण : नयन स्वामी
जलगांव से पधारे पूज्य नयन स्वामी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि बुरहानपुर मंदिर में विराजमान भगवान लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज की मूर्ति अत्यंत चमत्कारी एवं कृपालु है। यहां केवल भक्त ही नहीं बल्कि संत भी जो कुछ भगवान से मांगते हैं, उनकी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। उन्होंने कहा कि बुरहानपुर में सेवा करने वाले संतों को आगे चलकर बड़े-बड़े मंदिरों की सेवा एवं जिम्मेदारियां प्राप्त होती हैं। भगवान लक्ष्मीनारायण देव सभी भक्तों और संतों की इच्छाओं को पूर्ण कर उन्हें सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करते हैं।
मोर पंख के दिव्य वस्त्रों में हुए भगवान के दर्शन, भाव-विभोर हुए श्रद्धालु
अंतिम दिन की श्रृंगार आरती में भगवान लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज मोर पंख से सुसज्जित दिव्य वस्त्रों में विराजमान हुए। भगवान का यह मनोहारी स्वरूप देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कई भक्तों की आंखों से आनंदाश्रु छलक पड़े। मंदिर परिसर भगवान के जयघोष और भक्ति रस से सराबोर हो गया।
संतों ने बताया कि भगवान लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज स्नान सेवा से विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं। बुरहानपुर मंदिर में अधिक पुरुषोत्तम मास के दौरान लगातार 30 दिनों तक भगवान का दिव्य अभिषेक किया गया। ऐसी मान्यता है कि भगवान भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
संतों एवं सेवकों का हुआ सम्मान
अधिक पुरुषोत्तम मास के अंतिम दिन मंदिर में विराजित पूज्य शास्त्री चिंतनप्रियदासजी स्वामी, शास्त्री चंद्रप्रकाश स्वामी, मंदिर के कोठारी पूज्य पी पी स्वामी, वड़ताल से पधारे के.पी. स्वामी तथा अन्य संतों की पावन उपस्थिति में पूर्व पार्षदवर्य घनश्याम भगत सहित सेवाभावी भक्तों का शाल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया।
व्यासपीठ से सुनाई प्रेमलक्षणा भक्ति, मथुरा लीला एवं सांदीपनि आश्रम की कथा
अधिक पुरुषोत्तम मास के अंतिम दिन व्यासपीठ से पूज्य शास्त्री चिंतनप्रियदासजी स्वामी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध की कथा का रसपान कराया। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों का वर्णन करते हुए भक्तों को आध्यात्मिक संदेश प्रदान किया।
प्रेमलक्षणा भक्ति
स्वामीश्री ने बताया कि प्रेमलक्षणा भक्ति वह है जिसमें भक्त भगवान की आराधना किसी फल, लाभ या स्वार्थ के लिए नहीं करता, बल्कि केवल प्रेमवश भगवान की सेवा और स्मरण करता है। वृंदावन की गोपियों की भक्ति प्रेमलक्षणा भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है, जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया था।
मथुरा लीला
भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा पहुंचकर अत्याचारी कंस का वध किया और धर्म की पुनः स्थापना की। मथुरा लीला यह संदेश देती है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान अपने भक्तों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होते हैं।
जनेऊ संस्कार
भगवान श्रीकृष्ण एवं बलराम का उपनयन संस्कार वैदिक परंपरा के अनुसार संपन्न हुआ। जनेऊ संस्कार व्यक्ति के जीवन में ज्ञान, अनुशासन, सदाचार और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में शिक्षा
उपनयन संस्कार के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण एवं बलराम ने उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर वेद, वेदांग, शास्त्र, धनुर्विद्या, राजनीति और अनेक विद्याओं का अध्ययन किया। उन्होंने अल्प समय में समस्त विद्याओं में पारंगत होकर गुरु सेवा और गुरु भक्ति का आदर्श स्थापित किया।
भगवान को अर्पित किया गया छप्पन भोग
मंदिर के मीडिया प्रभारी गोपाल देवकर ने बताया कि अधिक पुरुषोत्तम मास के अंतिम दिन भगवान श्री लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज को भव्य छप्पन भोग अर्पित किया गया। भगवान को भोग लगाने के पश्चात प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया गया। बड़ी संख्या में भक्त प्रसाद अपने साथ घर भी ले गए। 30 दिनों तक चले इस दिव्य पुरुषोत्तम मास महोत्सव का समापन भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। पूरे माह मंदिर में आयोजित अभिषेक, कथा, कीर्तन एवं धार्मिक आयोजनों ने हजारों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति का अनुपम अनुभव प्रदान किया।



